systemhalted by Palak Mathur

शिकवा नहीं है अब उससे

रोज़ अपनी ही तैलाश में निकलता हूँ सवेरे,
पर अपने आप को न पा पता हूँ,
जिंदगी भी अब परेशान है मुझसे,
शिकवा नहीं है अब उससे।

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