systemhalted by Palak Mathur

पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते

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दर्द कितना है दिल में न जान पाओगे, हम रोज़ अपने ग़म का इश्तेहार नहीं करते, जो आँख से टपकें लहू तो बतायेंगे, पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते॥

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